कक्षा 12 गणित — विस्तृ त नोट्स
(उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद — UP Board पाठ्यक्रम, व्याख्या व उदाहरण सहित)
अध्याय 1: संबध
ं एवं फलन (Relations and Functions)
यह अध्याय बताता है कि दो समुच्चयों के बीच अवयवों का आपस में क्या संबंध है, और वह संबंध किस विशेष प्रकार (स्वतुल्य,
सममित आदि) का है। फलन एक विशेष प्रकार का संबंध है जिसमें प्रांत के प्रत्येक अवयव का ठीक एक ही प्रतिबिंब सहप्रांत में
होता है।
संबध
ं के प्रकार
माना A एक समुच्चय है और R, A×A का उपसमुच्चय है। R को निम्न गुणों के आधार पर पहचाना जाता है:
● स्वतुल्य (Reflexive): हर a के लिए (a,a) ∈ R होना चाहिए — यानी हर अवयव का स्वयं से संबध
ं हो
● सममित (Symmetric): यदि a का b से संबध
ं है तो b का भी a से संबध
ं होना चाहिए
● संक्रामक (Transitive): यदि a का b से और b का c से संबध
ं है, तो a का c से भी संबध
ं होना चाहिए
● तुल्यता संबध
ं : जब तीनों गुण (स्वतुल्य + सममित + संक्रामक) एक साथ मिलें
उदाहरण: सिद्ध कीजिए कि पूर्णां कों के समुच्च य Z में R = {(a,b) : (a-b) 3 से भाज्य है} एक तुल्य ता
ं ंध है।
सब
1. स्वतुल्य: (a-a)=0, जो 3 से भाज्य है ⇒ (a,a)∈R ✓
2. सममित: यदि (a-b) 3 से भाज्य है तो (b-a) = -(a-b) भी 3 से भाज्य है ⇒ (b,a)∈R ✓
3. संक्रामक: यदि (a-b) और (b-c) दोनों 3 से भाज्य हैं तो इनका योग (a-c) भी 3 से भाज्य होगा ⇒ (a,c)∈R
✓
4. अतः R तुल्यता संबध
ं है।
फलनों के प्रकार
फलन f: A→B में यह दे खा जाता है कि प्रतिबिंब कैसे बनते हैं:
● एकैकी (One-one): अलग-अलग निवेश (input) के प्रतिबिंब भी अलग-अलग हों, कोई दोहराव नहीं
● आच्छादक (Onto): सहप्रांत B का कोई भी अवयव बिना प्रतिबिंब के नहीं रहना चाहिए, यानी हर b के लिए
कोई a ज़रू र मिले
● एकैकी आच्छादक (Bijective) फलन ही उलटा (invertible) होता है — तभी f⁻¹ को परिभाषित किया जा
सकता है
उदाहरण: जाँचिए कि f: R→R, f(x) = 2x+3 एकै की है या नहीं।
1. मान लें f(x₁) = f(x₂)
2. 2x₁+3 = 2x₂+3 ⇒ 2x₁ = 2x₂ ⇒ x₁ = x₂
3. अतः f एकैकी है। साथ ही यह आच्छादक भी है क्योंकि किसी भी y के लिए x=(y-3)/2 मिल जाता है, अतः f
एकैकी-आच्छादक है।
, अध्याय 2: प्रतिलोम त्रिकोणमितीय फलन (Inverse Trigonometric
Functions)
त्रिकोणमितीय फलन (sin, cos, tan आदि) एकैकी नहीं होते इसलिए इनका प्रतिलोम पूरे प्रांत पर परिभाषित नहीं किया जा
सकता। इसलिए एक 'मुख्य मान शाखा' चुनी जाती है जहाँ फलन एकैकी-आच्छादक बन जाए, और वहीं प्रतिलोम फलन
परिभाषित होता है।
मुख्य मान शाखा
हर प्रतिलोम त्रिकोणमितीय फलन का एक निश्चित प्रांत और परिसर होता है — इन्हें रटना ज़ रू री है क्योंकि उत्तर हमेशा
इसी परिसर में देना होता है:
● sin⁻¹x → प्रांत [-1,1], परिसर [-π/2, π/2]
● cos⁻¹x → प्रांत [-1,1], परिसर [0, π]
● tan⁻¹x → प्रांत R, परिसर (-π/2, π/2)
● cot⁻¹x → प्रांत R, परिसर (0, π)
● sec⁻¹x → प्रांत |x|≥1, परिसर [0,π] − {π/2}
● cosec⁻¹x → प्रांत |x|≥1, परिसर [-π/2,π/2] − {0}
महत्वपूर्ण सूत्र
ये सूत्र दो प्रतिलोम फलनों के जोड़ या दो पदों को एक में बदलने के काम आते हैं:
● sin⁻¹x + cos⁻¹x = π/2 , tan⁻¹x + cot⁻¹x = π/2 , sec⁻¹x + cosec⁻¹x = π/2
● sin⁻¹(-x) = -sin⁻¹x (विषम फलन) , cos⁻¹(-x) = π - cos⁻¹x
● tan⁻¹x + tan⁻¹y = tan⁻¹[(x+y)/(1-xy)] (शर्त : xy < 1)
उदाहरण: मान ज्ञ ात कीजिए: tan⁻¹(1) + tan⁻¹(1/2) + tan⁻¹(1/3)
1. पहले tan⁻¹(1/2)+tan⁻¹(1/3) को जोड़ें: = tan⁻¹[(1/2+1/3)/(1-1/6)] = tan⁻¹[(5/6)/(5/6)] =
tan⁻¹(1) = π/4
2. अब tan⁻¹(1) + π/4 = π/4 + π/4 = π/2
3. उत्तर: π/2
अध्याय 3: आव्यूह (Matrices)
आव्यूह संख्याओं की एक आयताकार व्यवस्था है जिसे पंक्तियों (rows) और स्तंभों (columns) में लिखा जाता है। इसका
उपयोग रैखिक समीकरणों को संक्षेप में व्यक्त करने तथा हल करने में होता है।
आव्यूह के प्रकार
आव्यूह की पहचान उसकी कोटि (order) m×n तथा अवयवों की व्यवस्था से होती है:
● वर्ग आव्यूह: पंक्ति संख्या = स्तंभ संख्या (m=n)
● विकर्ण आव्यूह: मुख्य विकर्ण के अलावा बाकी सभी अवयव 0
● तत्समक आव्यूह I: विकर्ण पर 1, बाकी सब 0 — यह गुणन में वैसे ही काम करता है जैसे संख्याओ ं में 1
● सममित आव्यूह: A = A′ (ट्रांसपोज़ करने पर वही आव्यूह मिले)
(उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद — UP Board पाठ्यक्रम, व्याख्या व उदाहरण सहित)
अध्याय 1: संबध
ं एवं फलन (Relations and Functions)
यह अध्याय बताता है कि दो समुच्चयों के बीच अवयवों का आपस में क्या संबंध है, और वह संबंध किस विशेष प्रकार (स्वतुल्य,
सममित आदि) का है। फलन एक विशेष प्रकार का संबंध है जिसमें प्रांत के प्रत्येक अवयव का ठीक एक ही प्रतिबिंब सहप्रांत में
होता है।
संबध
ं के प्रकार
माना A एक समुच्चय है और R, A×A का उपसमुच्चय है। R को निम्न गुणों के आधार पर पहचाना जाता है:
● स्वतुल्य (Reflexive): हर a के लिए (a,a) ∈ R होना चाहिए — यानी हर अवयव का स्वयं से संबध
ं हो
● सममित (Symmetric): यदि a का b से संबध
ं है तो b का भी a से संबध
ं होना चाहिए
● संक्रामक (Transitive): यदि a का b से और b का c से संबध
ं है, तो a का c से भी संबध
ं होना चाहिए
● तुल्यता संबध
ं : जब तीनों गुण (स्वतुल्य + सममित + संक्रामक) एक साथ मिलें
उदाहरण: सिद्ध कीजिए कि पूर्णां कों के समुच्च य Z में R = {(a,b) : (a-b) 3 से भाज्य है} एक तुल्य ता
ं ंध है।
सब
1. स्वतुल्य: (a-a)=0, जो 3 से भाज्य है ⇒ (a,a)∈R ✓
2. सममित: यदि (a-b) 3 से भाज्य है तो (b-a) = -(a-b) भी 3 से भाज्य है ⇒ (b,a)∈R ✓
3. संक्रामक: यदि (a-b) और (b-c) दोनों 3 से भाज्य हैं तो इनका योग (a-c) भी 3 से भाज्य होगा ⇒ (a,c)∈R
✓
4. अतः R तुल्यता संबध
ं है।
फलनों के प्रकार
फलन f: A→B में यह दे खा जाता है कि प्रतिबिंब कैसे बनते हैं:
● एकैकी (One-one): अलग-अलग निवेश (input) के प्रतिबिंब भी अलग-अलग हों, कोई दोहराव नहीं
● आच्छादक (Onto): सहप्रांत B का कोई भी अवयव बिना प्रतिबिंब के नहीं रहना चाहिए, यानी हर b के लिए
कोई a ज़रू र मिले
● एकैकी आच्छादक (Bijective) फलन ही उलटा (invertible) होता है — तभी f⁻¹ को परिभाषित किया जा
सकता है
उदाहरण: जाँचिए कि f: R→R, f(x) = 2x+3 एकै की है या नहीं।
1. मान लें f(x₁) = f(x₂)
2. 2x₁+3 = 2x₂+3 ⇒ 2x₁ = 2x₂ ⇒ x₁ = x₂
3. अतः f एकैकी है। साथ ही यह आच्छादक भी है क्योंकि किसी भी y के लिए x=(y-3)/2 मिल जाता है, अतः f
एकैकी-आच्छादक है।
, अध्याय 2: प्रतिलोम त्रिकोणमितीय फलन (Inverse Trigonometric
Functions)
त्रिकोणमितीय फलन (sin, cos, tan आदि) एकैकी नहीं होते इसलिए इनका प्रतिलोम पूरे प्रांत पर परिभाषित नहीं किया जा
सकता। इसलिए एक 'मुख्य मान शाखा' चुनी जाती है जहाँ फलन एकैकी-आच्छादक बन जाए, और वहीं प्रतिलोम फलन
परिभाषित होता है।
मुख्य मान शाखा
हर प्रतिलोम त्रिकोणमितीय फलन का एक निश्चित प्रांत और परिसर होता है — इन्हें रटना ज़ रू री है क्योंकि उत्तर हमेशा
इसी परिसर में देना होता है:
● sin⁻¹x → प्रांत [-1,1], परिसर [-π/2, π/2]
● cos⁻¹x → प्रांत [-1,1], परिसर [0, π]
● tan⁻¹x → प्रांत R, परिसर (-π/2, π/2)
● cot⁻¹x → प्रांत R, परिसर (0, π)
● sec⁻¹x → प्रांत |x|≥1, परिसर [0,π] − {π/2}
● cosec⁻¹x → प्रांत |x|≥1, परिसर [-π/2,π/2] − {0}
महत्वपूर्ण सूत्र
ये सूत्र दो प्रतिलोम फलनों के जोड़ या दो पदों को एक में बदलने के काम आते हैं:
● sin⁻¹x + cos⁻¹x = π/2 , tan⁻¹x + cot⁻¹x = π/2 , sec⁻¹x + cosec⁻¹x = π/2
● sin⁻¹(-x) = -sin⁻¹x (विषम फलन) , cos⁻¹(-x) = π - cos⁻¹x
● tan⁻¹x + tan⁻¹y = tan⁻¹[(x+y)/(1-xy)] (शर्त : xy < 1)
उदाहरण: मान ज्ञ ात कीजिए: tan⁻¹(1) + tan⁻¹(1/2) + tan⁻¹(1/3)
1. पहले tan⁻¹(1/2)+tan⁻¹(1/3) को जोड़ें: = tan⁻¹[(1/2+1/3)/(1-1/6)] = tan⁻¹[(5/6)/(5/6)] =
tan⁻¹(1) = π/4
2. अब tan⁻¹(1) + π/4 = π/4 + π/4 = π/2
3. उत्तर: π/2
अध्याय 3: आव्यूह (Matrices)
आव्यूह संख्याओं की एक आयताकार व्यवस्था है जिसे पंक्तियों (rows) और स्तंभों (columns) में लिखा जाता है। इसका
उपयोग रैखिक समीकरणों को संक्षेप में व्यक्त करने तथा हल करने में होता है।
आव्यूह के प्रकार
आव्यूह की पहचान उसकी कोटि (order) m×n तथा अवयवों की व्यवस्था से होती है:
● वर्ग आव्यूह: पंक्ति संख्या = स्तंभ संख्या (m=n)
● विकर्ण आव्यूह: मुख्य विकर्ण के अलावा बाकी सभी अवयव 0
● तत्समक आव्यूह I: विकर्ण पर 1, बाकी सब 0 — यह गुणन में वैसे ही काम करता है जैसे संख्याओ ं में 1
● सममित आव्यूह: A = A′ (ट्रांसपोज़ करने पर वही आव्यूह मिले)