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मुंबई की एक पुरानी चाल में एक दरवाज़ा था जो किसी कमरे में नहीं खुलता
था।
दीवार के बीचोबीच, लकड़ी का पुराना दरवाज़ा। न उसके पीछे दीवार थी, न
कोई कमरा। बस दरवाज़ा।
चाल के लोग उसे नज़रअंदाज़ करते थे। नई किरायेदार — रिया — नहीं कर
SI
पाई।
एक रात उसने दरवाज़े पर दस्तक दी। कोई जवाब नहीं।
उसने हैंडल घुमाया।
दरवाज़ा खुल गया।
VE
उस तरफ उसका अपना पुराना घर था — वो जहाँ वो बचपन में रहती थी,
लखनऊ में। सब कुछ वैसा ही जैसा था — रसोई से माँ के हाथ का खाना
पकने की खुशबू, पिताजी का पुराना रेडियो, छत पर टँगी कपड़े की
रस्सियाँ।
वो अंदर गई। माँ ने पलटकर देखा और मुस्कुराईं, जैसे कि रिया कभी गई ही
नहीं थी।
वो वहाँ शाम बिताई। खाना खाया। हँसी। सोते वक्त माँ ने सिर पर हाथ फेरा।
सुबह वो वापस अपने कमरे में थी।
दरवाज़ा अब बंद था।
रिया उसके पास गई और धीरे से हाथ रखा।
"शुक्रिया," उसने फुसफुसाया।
लकड़ी थोड़ी गर्म लगी। जैसे जवाब में।
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मुंबई की एक पुरानी चाल में एक दरवाज़ा था जो किसी कमरे में नहीं खुलता
था।
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दीवार के बीचोबीच, लकड़ी का पुराना दरवाज़ा। न उसके पीछे दीवार थी, न
कोई कमरा। बस दरवाज़ा।
चाल के लोग उसे नज़रअंदाज़ करते थे। नई किरायेदार — रिया — नहीं कर
पाई।
एक रात उसने दरवाज़े पर दस्तक दी। कोई जवाब नहीं।
उसने हैंडल घुमाया।
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दरवाज़ा खुल गया।
उस तरफ उसका अपना पुराना घर था — वो जहाँ वो बचपन में रहती थी,
लखनऊ में। सब कुछ वैसा ही जैसा था — रसोई से माँ के हाथ का खाना
पकने की खुशबू, पिताजी का पुराना रेडियो, छत पर टँगी कपड़े की
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रस्सियाँ।
वो अंदर गई। माँ ने पलटकर देखा और मुस्कुराईं, जैसे कि रिया कभी गई ही
नहीं थी।
वो वहाँ शाम बिताई। खाना खाया। हँसी। सोते वक्त माँ ने सिर पर हाथ फेरा।
सुबह वो वापस अपने कमरे में थी।
दरवाज़ा अब बंद था।
रिया उसके पास गई और धीरे से हाथ रखा।
"शुक्रिया," उसने फुसफुसाया।
लकड़ी थोड़ी गर्म लगी। जैसे जवाब में।
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